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Tuesday, November 19, 2024

तेरे दिल का क्या पैगाम हैं....


 

...अगर संग तुम हो ,


 

जय श्री राम-हनुमान !.......


 

जय श्री राम!........

Wednesday, June 17, 2020

नारी का ही तो रूप है......

है छपी पुण्य गाथा जिसकी ,
वेदों के पावन पृष्ठ पर ।
क्यों समझते तुच्छ उसको ,
अपनी समझ को भ्रष्ट कर ।।

जिसने दिखाया संसार हमको ,
इस वसुधा पावन पुण्य पर।
हर वक़्त घड़ी साथ देती जो,
हम शिखर हो या शून्य पर ।।

वह मां नारी का ही तो रूप है......

प्रेम में जिसके हो मोहित ,
सुखी हो, दुखो को भूलकर ।
प्रेम बंधन में बंध गए हो,
जिसके संग तुम वेदी पर ।

वह प्रेमिका,पत्नी नारी का ही तो रूप है.......

तैयार प्राण भी त्यागने को
बहन को दिए एक वचन पर ,
क्यों दिखाते शान हम ,
उस बहन ,बेटी के ही पतन पर।

वह बहन,बेटी नारी का ही तो रूप है........

जिन देवियों को पूजते हम ,
सुख - दुखो के आगमन पर,
फिर कोख में क्यों मार देते ,
उस देवी के ही सृजन पर ।

वह देवी नारी का ही तो रूप है......

आज चिंता कर रहे हम ,
उस नारी की शशक्ति पर।
है अगणित अहसान जिसके,
इस धरा ,इस सृष्टि पर ।।

ये धरा भी नारी का ही तो रूप है.......

एक दिन वो था एक दिन ये है....

तेरा असर कुछ यूं हुआ मुझपर ,
की मेरे जाम में भी तेरे होठों का स्वाद है,
तेरी रूह की छूवन का मुझे अभी तक अहसास है ,
वो हकीकत थी या कोई हसीन सपना,
 इस सवाल में उलझ सा गया मैं,
तुझे संग में पाकर उही बेहते मेरे जज्बात है ||

एक दिन वो था एक दिन ये है....
आज भी याद है मुझे वो दिन ,
तुम पर मेरी नजरो का यूहीं अटक जाना ,
तेरे चेहरे से तेरे बालों का धीरे धीरे झटक जाना ,
तेरा खिलखिलाकर हसना, तेरे लब्जो कि शरारतें ,
मेरे दिल का तुझपर यूहीं पिघल जाना ||

हा याद है मुझे,
तुझे तकना और फिर तेरी आंखो की मस्तियां ,
तेरे लब्जो से मुलाकात का चल पड़ा था सिलसिला,
कुछ यू ही बड़ने लगी थी नजदीकियां ,
नजरो से हुआ था ये जो सिलसिला शुरू,
अब सुन रहा था मैं तेरी सांसों की सिसकियां ||

कभी टहलना संग तेरे, कभी आंखो में डूबना ,
कभी तेरे लब्जो से मुलाकात, कभी तेरी बातो को चूमना,
कभी यूहीं झूझना तेरे सवालों से ,
कभी तेरी लब्जो के तले तुझे बाहों में सोचना ||

यही सबकुछ था ,
एक दिन वो था एक दिन ये है ,
आज तू नहीं है संग मेरे बयां करू मैं किस बहाने को ,
इस महफिल में सितारे तो बहुत दिल लगाने को ,
लेकिन तुम्हारी कुछ अलग ही बात थी ,
काश तुम भी होती यह कुछ सुनने और मुझे कुछ सुनाने को||

Tuesday, June 16, 2020

उड़ रहा था मैं....

उन किरणों को समेटे,जीवन से जो मिली थी ,
ऊंचाइयों को पाने उड़ रहा था मैं ,
उन सपनों के पीछे, बचपन से थे जो सींचे ,
कोई खींच रहा या खुद ही खींचता जा रहा था मैं ||

कहीं मखमली बादल थे, कहीं डराती घटा ,
सबको गले से लगाकर बढ़ रहा था मैं ,
सपनों को लादे हुए, जीवन की इस राह में ,
ऊंचाइयों की डगर खोजता फिर रहा था मैं ||

कच्ची रस्सी के सहारे, पतली सी डगर पर ,
रस्सी टूटे, सपने जाएंगे सारे बिखर ,
उड़ने को तो फिर से मैं तैयार था ,
लेकिन रूखी सी लगने लगी थी ये डगर ||

जीवन जीने को ललचा रहा था मन ,
फिर से उड़ने को फड़फड़ा रहा था मन ,
गिरता आया हूं , गिरने से ना डरा कभी ,
लेकिन ना जाने क्यों अब घबरा रहा था मन ||

थक सा गया, रुक मैं गया हूं ,
ऊंचाइयों मैं कहीं खो गया हूं ,
जिन सपनों का पीछा किया था ,
उन सपनों को लिए सो गया हूं....... ||

Tuesday, April 7, 2020

जिंदगी में क्या बुरा?

कभी हारते- कभी जीतते चलती रहेगी जिंदगी,
कुछ सीखते - कुछ भुलते ढलती रहेगी जिंदगी ,
ढलते हुए - चलते हुए राह पर पत्थर मिले,
कुछ है लगे - कुछ है सजे,खिलती रहेगी जिंदगी ।

कुछ सीखकर गए भुल तुम , भुलो से ही सीखे हो तुम ,
कुछ नया भी अब सीख लों, कुछ भुल गए तो क्या बुरा?

कभी दौड़ते- कभी हांफते, लड़ती रहेगी जिंदगी‌‌ ,
कुछ जोश में- कुछ होश में, मिलती रहेगी जिंदगी,
लड़ते हुए - मिलते हुए, रंगमंच पर योद्धा मिले,
कुछ में सादगी - कुछ है चपल, दिखती रहेगी जिंदगी ।

कभी दौड़ते हुए रुक गए, रुकने से ही सोचोगे तुम,
जो रुककर मिला वो ना मिले, रुक भी गए तो क्या बुरा?

कभी उठते - कभी गिरते, सीखाती रहेगी जिंदगी,
कुछ खुदको - कुछ अपनों को, दिखाती रहेगी जिंदगी
सिखाते हुए - दिखाते हुए, राहों में राह मिले ,
कुछ गम - कुछ खुशी का, अहसास कराती रहेगी जिंदगी।

कभी गिरते हुए चोंटे लगी, चोंटो से है सीखे हो तुम,
अब उठ खड़े हो फिर से तुम, चोंट लगी तो क्या बुरा?

कभी रोते - कभी हंसते, मनाती रहेगी जिंदगी,
कुछ सोच - कुछ अफसोस में, डराती रहेगी जिंदगी,
डराते हुए - मनाते हुए, कभी अपने पराए मिले ,
कुछ नजदीक - कुछ दूर खड़े, बढ़ती रहेगी ज़िंदगी।

कभी सोचा था वो ना हुआ, इस सोच में बैठे हो तुम 
कुछ नया भी अब सोच लो, कुछ हो गया तो क्या बुरा?

Thursday, March 26, 2020

मैं कृष्ण हूं......


संघर्षों से सजा हुआ, प्रयत्नो से भजा हुआ ,
मै कवच कठोर सा अस्त्र हूं।
भावों से भरा हुआ, घाव से लड़ा हुआ,
विनम्रता विजय का मै वस्त्र हूं ।।

सवालों में उलझ रहा, ज्वाल में झुलस रहा,
ये भूल क्यों गया मैं खुद ही प्रश्न हूं.....
लक्ष्य है प्रबल रहा, सूर्य सा अचल रहा ,
सारथी मैं खुद का मै ही कृष्ण हूं.......

राम सा संघर्ष हुआ , बुद्ध सा स्पर्श हुआ ,
तभी तो जीव आत्मा में खुश रहूं......
शाहस से बढ़ता हुआ, प्रभास सा चढ़ता हुआ ,
मैं दृढ़ता के साथ चलता रहूं........

वेदी सा धधक रहा, पराजय को पटक रहा ,
परिश्रम के रस का विजय गीत हूं .....
यज्ञन् ये चल रहा , वज्र भी निकल रहा ,
किंचित भी नहीं भयभीत हूं........

Monday, September 2, 2019

कही धूप है,कही ‌‌‌‌छाव हैं.....

कही धूप है कही ‌‌‌‌छाव हैं ,
कभी दर्द मे डूबे पाव हैं ।।
कही उबङ़-खाबड़ रास्ता,
रास्ते में मिल रहे घाव हैं ।

कभी कर रहा आराम में ,
कभी चल रहा थकान में ,
कही वृक्षो की छाव हैं,
कही बादलो की गर्जना ,
कभी सुर्य का अहंकार भी है तोड़ने मुझको जला ,
लेकिन मेरी आग के आगे क्या टिक पाए भला ।।
कही धूप है.........…..।।

कही शहर है ,कही गाँव हैं ,
कभी प्रतिवाद में भी दाँव हैं ।।
कभी बिगड़ता मौसम है,
कभी डोलती मेरी नाव हैं ।

कभी लहरो का क्रोध है,
कभी आस्था की स्नेह लता,
कभी भय है अंधकार का,
कभी चाँद से रोशन घटा ,
अमावस्या अंधकार भी मुझको क्या रोकेगा भला,
है साहस का प्रकाश इतना अंधकार भी है चला।।
कही धूप है ..............।।


Sunday, July 7, 2019

मोबाइल


सुबह को जागकर पहला नमस्कार करता हुँ,
अपने मोबाइल को ,
क्योकि आजकल जगाता भी यही हैं ,
तो रूलाता-हँसाता भी यही हैं ,
बस सुलाती मेरी नींद ही है मुझे ,
नींद भी जब तक नही सुलाएगी ,
जब तक की वह अपनी चरम सीमा को
पार न करदें,
वरना इस मोबाइल के क्या ही कहने
यह सोने ही न दे मुझे ।।

मैं तो रूठता नही मोबाइल से ,
कभी मोबाईल जरूर रूठ जाता हैं ,
कभी बढ़ जाता है तापमान इसका ,
कभी आँखे बंद कर सो जाता हैं ,
तब करता हुँ जतन उसको जगाने के लिए,
और भागता हुँ बिजली की ओर ,
फिर से उसके साथ साथ कुछ गुनगुनाने के लिए ,
कुछ समझने के लिए,कुछ समझाने के लिए ,

किसी से करनी भी हो बात,
मोबाईल से ही कह देता हुँ ।
यही है दुनिया मेरी कुछ जानने,
खोजने मे यही तो एक सहारा हैं ,
कभी आन पडे़ समस्या,मोबाईल ही
की मदद से लगता किनारा हैं,
कुछ समझदार लोग कहते हैं ,
इसने बनाया-बिगाड़ा‌ हैं हमे ,
लेकिन बनाया इसे हमने ही हैं,
अपने फायदे के लिए,
ओर शायद खुद को बिगाड़ा भी,
ये मोबाइल तो बेकसुर बेचारा हैं ..........


Wednesday, May 22, 2019

इश्क की लहर

कही दूर अपने मन-मस्तिष्क को ले जाकर,
सोच रहा था कुछ मैं ।
अभी पहुँचा नही था मंजिल पर,
की मेरी नजरो ने मुझसे किनारा कर लिया ,
और अटक गई एक नूर से चेहरे पर जाकर ।
और एेसी अटकी नजरे मेरी ,
की पलके झपकने की इच्छा न हुई,
इच्छा तो हुई पलके बिछाने की,
उसके इंतजार में की टकते रहूँ उस लम्हे को
जब भी वो आएगी करीब मेरे,
मिलकर कुछ मीठे अल्फाज ही मुझसे कह दे ।
प्यार के नही तो कुछ और ही सही ,
बस इतना हो जाए,
फिर मैं बैचेन हो जाऊंगा उसकी यादो में ।
लेकिन क्या पता उन्हे मेरे जज्बात की कदर होगी या नही,
कदर होगी भी तो कैसै पता चलेगा मुझे ,
मान लिया की वह समझती है मुझे ,
लेकिन क्या इज्हारे इश्क भी कर देगी वह नूर,
क्योकि मुझको तो लगता है डर,
इश्क के संगीत को छेड़ने में ,
इश्क के समुन्दर में तैरने में ,
वैसे तैराक बड़ा अच्छा हूँ मैं ,
अनेको बार लहरो को भी मात दी हैं ,
लेकिन यह इश्क की लहर ही कुछ एसी है,
की डर लगता है कही गुम सा न हो जाऊ इसमें ।
डर लगना भी स्वाभाविक हैं,
क्योकि इस इश्क की लहर का अंदाजा नही हैं मुझे
और जिस किसी ने भी इस इश्क की लहर को,
ब़या किया वह मुझे गुम सा ही लगा,
या साफ शब्दो में कहु तो रोता ही पाया गया ।
कभी इस इश्क की लहर से उजड़ने पर ,
तो कभी इस इश्क की लहर के ठहर जाने पर..................


Sunday, May 12, 2019

माँ

दूर कही अपने संसार मैं ही मस्त हुँ मैं ।
कर्म,व्यथा की कथा सुनाने में व्यस्त हुँ मैं ।
जिसने मिलवाया है इस संसार से मुझे,
उस माँ के लिए ही सुर्य सा अस्त हुँ मैं ।।

राह टकती होगी माँ जानता हुँ,समय के आगे पस्त हुँ मैं।
सांसारिक मोह माया के इस जंजाल से त्रस्त हुँ मैं ।
माँ तेरे करूणा के आँछल की छाया हो साथ बस ,
कठिनाईयो,कष्टो,पराजय के लिए भी कष्ट हुँ मैं ।।

कुछ पाने की धुन मैं वक्त की कमी सी हैं ।
वह दुलार, डाँट नही अब,वक्त से ठनी सी हैं।
जब कभी करता हुँ बात माँ तुमसे फोन पर,
लगता हैं बातो में भी आजकल नमी सी हैं।

Friday, April 26, 2019

प्यार भी न देख सकी


तेरे चेहरे के नूर पर कुछ इस तरह फिदा़ हुआ मैं ।
मेरी नजरे अटक गई तुम पर,आँखे भी न थकी ।।
मैने तो तेरी आँखो में अपना संसार देख लिया ।
और तुम मेरी आँखो में प्यार भी न देख सकी ।।

माना की इज्हार लब्जो से नही आँखो से किया ।
लब्जो से निकल सकता है झुठ,आँखो से नही ।।
तुम तो छिपाए बैठी हो अपने दिल के जज्बात को ।
कम से कम मैने इश्क का इज्हार किया तो सही ।।

Saturday, April 13, 2019

"हार को मैं दुखता हुँ "


हारना सीखा नही,फिर भी मैं हार जाता हूँ ।
किस्मत से भी अनेको बार मार खाता हूँ।
फिसलता - गिरता - उठता - संभलता मैं ।
मेहनत का थाम हाथ सपनो संग चलता हूँ ।

पाने को सपने राहो पर बढ़ता जाता हूँ।
डरता हुँ, हार को भी अनेको बार डराता हूँ।
कभी तो चमकूंगा इस ब्रह्माण्ड के पटल पर ।
अंतिरक्ष के वातावरण में छाया सा सन्नाटा हूँ।

कभी देखने को सपने रातो को जागता हूँ।
सपनो को पाने कच्चे रास्ते पर भागता हूँ ।
सपनो को पाना मुझे हार को भी हराना हैं ।
दिन-रात अपने सपनो का राग ही रागता हूँ।

हार को हराने को सबूत मैं पुखता हूँ ।
हार के पहाड़ से न रूकता ,न झुकता हूँ।
यह तो तय है सपनो को जी भी लुंगा एक दिन ।
की हार खुद कहे की हार को मैं दुखता हूँ ।










Thursday, March 21, 2019

इश्क का रंग


रंग बरस रहा है फिजाओ में ,
हम खोए उनकी अदाओ में ।
की आयेगी वो करीब हमारे ,
हम पुष्प बिखेरेंगे उनकी राहो में।

टकते रहे जी भरकर उनको,
हेै रंग गुलाल लगाने को  ।
इंतजार कर रहे थे उनका ,
उन्हे रंगो से सजाने को ।

इतने में ही एक इन्तेहा हो गई ,
वह खुद ही मेरे करीब आ गई ।
हाथो में लिये हुए इश्क का रंग ,
फिर से वह मेरे दिल को भा गई ।।

एक सुनहरा स्पर्श हुआ गालो पर ,
मिल गई है अब नजरो से नजर ।
हे हो गई धड़कन तेज मेरी ,
लगता है दिल पर हुआ असर ।।

सोचा था हम उनके करीब जाएंगे ,
अपना हाथ उनके हाथो में थमाएंगे ।
स्पर्श करेंगे उनके मखमली गालो का ,
और फिर उनकी यादो में खो जाएंगे ।।

जैसा सोचा था वैसा हुआ नही ,
जो हो रहा वह है बहुत सही ।
वो देखकर मुझको मुस्कुराई ,
और पुछ बैठी क्या खो गए कही ।।

क्या कहु की डुबा था तुम्हारे खयालो में ,
साथ चलना तुम्हारे,जीवन की इन राहो में ।
लेकिन कुछ न निकला जुबा से मेरे ,
उलझ कर रह गया अपने ही सवालो में ।।

काश तुम खुद ही मेरे जज्बात को समझ लों ,
मैं सुनता हु रोज तुम भी मेरी धड़कन को सुन लो ।
और कर ही दो इज्हारे इश्क रंग लगाने के बहाने.........









Sunday, March 3, 2019

समय


समय, एक पुकार है ,
कुछ नया करने की हुँकार हैं ।
समय, निस्तब्द्ध्ता त्यागने का संदेश है ।
लक्ष्य प्राप्ति में लग जाने का संकेत है ।

समय, अविरल ज्ञान है ।
इसमें छिपा सर्व विज्ञान है ।
व्याकुल पथिक का पथ है ।
भुत ,भविष्य से सजा रथ है ।

समय, असफलता की व्यथा हैं।
सफलता के मार्ग की कथा हैं ।
समय निश्लता का प्रतिक हैं ‌।
समय संग लक्ष्य सटीक हैं ।


Friday, February 1, 2019

मंजिल

है दुर खड़ा , है सुदूर खड़ा ।
मंजिल के सपने देखु मैं ।
आखो में जज्बा लिए हुए ।
मंजिल को करीब देखु मैं ।।

है पार करू मैं पहाड़ बड़ा ।
मंजिल को पाने की जिद में ।
सपनो की गठरी लिए हुए ।
उस पथ पर चल रहा हुँ मैं ।।

हे सीख रहा,डर से भी लड़ा ।
मेहनत करने तैयार हुँ मैं ।
कई हार,निराशा लिए हुए ।
हर पल कर रहा प्रहार हुँ मैं ।।

मंजिल की राह में उलझ पड़ा ।
हे राह को सुलझा रहा हुँ मैं ।
है सीख राह की लिए हुए ।
करता जा रहा प्रयास हुँ मैं ।।

मंजिल को पाने को मैं अड़ा ।
आगे ही बड़ रहा हुँ मैं ।
अनेक इच्छाए लिए हुए ।
राह पर निकल पड़ा हुँ मैं ।।




Friday, January 4, 2019

चित्रकार


एक नया संसार रचने ।
चला है व्याकुल एक मुसाफिर ।।
अस्त्र लिए तैयार अपने ।
संजाने को नया संसार फिर ।।
कुछ देखा सा ,कुछ है सपने ।
कुछ लिए अपनी कल्पना के नीर ।।
अपने संसार को संवारने ।
पग में है तेजी, मन में है धीर ।।
उड़ता जा रहा संसार को रंगने ।
मानो बहता हुआ समीर ।।
चित्र अपने संसार के उकेरने ।
निकला था वह मुसाफ़िर ।।

Thursday, January 3, 2019

नववर्ष

नव वर्ष का मधुर आगमन ।
स्वागत करने उत्साहित मन ।।
नए लक्ष्य है , है कुछ सपने ।
पुर्ण करने का करना जतन ।।
भुल बीती बातो को उन ।
जिसने दुखाया तेरा मन ।।
नया समय,भविष्य नया लिखने ।
सही निर्णय संग बड़ा कदम ।।

Monday, December 24, 2018

सवेरा- मेरी चमकदार छाया ।


हर रोज निकलता घर से मैं ,
एक नए सवेरे कि तलाश में ।

सवेरा, परिश्रम के केसरी रंग से रंगा ,
लक्ष्य की सुगंधित महक से सजा ।
मानो कह रहा, खुला आकाश हैं ,
उड़ जा जहा है तेरी चाह ।।

सवेरा, सुर्य सा तेज लिए ,
किरणों पर असवार होकर चले ।
मानो कह रहा, वायु की तरह ,
रुकना नही, चलना ही हैं,चलते रहे ।

सवेरा, उर्जा का करे संचार जो
त्याग सभी पराजय के तमस को,
मानो कह रहा किरणो सा स्पर्श हैं ।
संघर्ष संग लक्ष्य प्राप्त होने का।।

सवेरा, जो मेरी ही चमकदार छाया हैं ,
सफलता पर जो उभर कर आएगा ।
मानो कह रहा, खुद से ही मैं ,
प्राप्त कर लुंगा मैं सवेरे को ।।





Saturday, November 24, 2018

“मतदान ”


  -कृष्ण गोपाल प्रजापति

उठो जागो मतदान करो,
है यही समय की पुकार ।
पाँच वर्ष में आता है ,
एेसा मौका एक बार ।।
पोलिंग बूथ पर जाना आपको ,
E.V.M का बटन दबाना है ।
लोकतंत्र का पर्व है यह,
इस पर्व को सफल बनाना है ।।

लोकतंत्र ने दिया आपको ,
निर्णय लेने का उपहार ।
परिचय जागरुक नागरिक का है,
मतदान है अधिकार ।।
यह , वह है जहाँ चाह ,
किसी के बहकावे में न आना है ।
मत है आपका बहुत कीमती ,
स्वयं का निर्णय अपनाना है।

करो जागरूक लोगो को ,
मतदान करें इस बार ।
जागरुक मतदाता का देना है ,
परिचय अबकी बार ।।
देना है योगदान आपको ,
उन्नत राष्ट्र बनाना है ।
शत प्रतिशत करना मतदान है ,
लोकतंत्र को मजबूत बनाना है ।।

उठो जागो मतदान करो,
है यही समय की पुकार ।
पाँच वर्ष में आता है ,
एेसा मौका एक बार ।।

Wednesday, October 31, 2018

जीवन में कुछ करना हमको




जीवन में कुछ करना हमको ,
आगे-आगे बढ़ना हमको ।।
लक्ष्य पर बांधे है निगाहे ,
निरंतर आगे चलना हमको ।
मुश्किलो के पहाड़ तो आएगे पर,
कठिन चढ़ाई चढ़ना हमको ।

जीवन में कुछ करना हमको ,
आगे-आगे बढ़ना हमको ।।

धरती चल रही , तारे चल रहे ,
चांद रात भर चल रहा है,
प्रातः काल नभ में किरणो संग,
सुर्य भी रोज निकल रहा हैं ।।
त्याग निस्तबद्धता, चलना हमको,जीतना हमको ।
निरंतर कल-कल बहना हमको ,
नदी भी यही सिखाए हमको ।।

जीवन में कुछ करना हमको ,
आगे-आगे बढ़ना हमको ।।


Wednesday, October 24, 2018

नया समय, सवेरा नया



प्रात: काल नभ से , बहती किरणो की धाराए ।
लुप्त हुआ तमस है , पुष्प,पौधे,तरू हर्षाए ।।
पक्षी को मिला संसार नया,
उड़ने को,चहचहाने को ।
जन्तु को मिला लक्ष्य नया ,
अपनी किस्मत आजमाने को ।।
किसी को जगाए ,समय की पहचान कराए ।
नया समय,नई शुरुआत का अहसास दिलाए ।।
जिसने तुम्हे कमजोर बनाया,
भुल बीती उन बातो को ।
नया समय,सवेरा नया नई उमंग है लाया,
नए मार्ग पर बढते जा,पाने अपने लक्ष्य को।।




Friday, October 19, 2018

विजयदशमी

                    विजयदशमी-एक सीख

रावण का करना वध, सत्य की विजय को मानना ।
बड़ो का कर आदर , राम को अपने अंदर खोजना ।
प्रेरणा पुरूषोत्तम से लेकर, अच्छे कर्मो की ठानना ।।
ईर्ष्या,द्वेष,भ्रष्टाचार, दुसरो का बुरा करना ।
आत्मचिंतन कर, इन बुराईयाे को अपने से निकालना ।।
राम-लक्ष्मण की तरह , भाईयो में स्नेह रखना ।
हनुमान की तरह , वक्त आने पर कुछ भी कर गुजरना ।।
विभिषण की तरह , सत्य को पहचानना ।
वानरो की तरह , सत्य का साथ देना ।।
विपरीत परिस्थतियो में अपने आप को संभालना ।
जीवन में अनेक बाधाओ का कर सामना ।
सत्य के साथ आगे बड़ते जाना ।
असत्य पर सत्य की पताखा फैराना ।।
राम के आदर्शो को हमें है अपनाना ।
सदैव सत्य के मार्ग पर चलते जाना ।
विजयादशमी का त्यौहार यही चाहता है सीखाना ।।


               

संघर्ष a poem by Krishna Gopal Prajapati

                              संघर्ष

प्रतिदिन-प्रतिपल संघर्ष से सुसज्जित ।
मनमोहक जीवंत यह , रुकना है वर्जित ।।
लक्ष्य के मार्ग में , बाधाए भिन्न है ।
है हौसला मन में , तो बाधाए भी छिन्न है।।
लक्ष्य को करना है, यदि तुम्हे है अर्जित ।
संघर्ष से ही होता है, मानुष उत्सर्जित ।।
लक्ष्य की प्राप्ति में , संघर्ष अंग अभिन्न है ।
जिसने जाना संघर्ष को , वही तो सम्पन्न है ।।